एससी ओबीसी का दुश्मन बना और ओबीसी मुस्लिम का ऐसा क्यों
किसने कहा कि फुट डालो, शासन करो की नीति अंग्रेज ने चलाई..?
फुट डालो शासन करो की नीति मनु वादियों ने हजारों सालों से व्यवस्था कायम करके रखी है।
फिलहाल आर्टिकल के मुख्य मुद्दे पर विस्तृत चर्चा करना उचित रहेगा..
राजनीतिक साजिशकारों ने आंबेडकर के नीति को तोड़ने के लिए भरसक प्रयास किया और हद तक सफल साबित हुई।
पहले अनुसूचित जाति की बात होनी चाहिए..
भारत के संविधान अनुच्छेद 17 कहता है कि किसी के साथ छुआछूत और भेदभाव हुआ तो वह दंडनीय अपराध है। छुआछूत जैसे जगन अपराध अनुसूचित जाति और जनजाति में नहीं बल्कि ओबीसी के अलावा सवर्ण महिलाओं में भी होती है।लेकिन कांग्रेसी ने इसका दायरा एससी एसटी एक्ट1989 में सीमित करके ओबीसी से अलग अनुसूचित जाति को कर दिया..वकील/पुलिस छोटी मोटी बात में ओबीसी के खिलाफ एससी एसटी एक्ट ठोक देते..जिसके कारण ओबीसी को एससी से दूरियां बढ़ती चली गई..क्योंकि वकील साहब/पुलिस भी मनुवादी तबके से आते उनका भी एससी एसटी एक्ट कमाई का जरिया बन गया...धीरे धीरे ओबीसी समाज और एससी एसटी के बीच लंबी दूरियां बनते चली गई..
सवाल उठता है कि संविधान का अनुच्छेद छुआछूत जैसे जघन अपराध पर जाति व्यवस्था को स्वीकार नहीं करता तो फिर जातियों के दायरे में सिमट कर क्यों कानून बनाया गया..? इस साजिश को पत्रकार सामाजिक कार्यकर्ता और नेताओं ने क्यों नहीं समझ पाया..?
इसके बाद ओबीसी आरक्षण लागू करने की बात आई..आप मंडल कमिशन की रिपोर्ट को अध्ययन कीजिए..तो यकीनन मालूम होगा कि ओबीसी समाज को आरक्षण में क्रीमी लेयर लगाने की कोई आवश्यकता नहीं। क्रीमी लेयर लगाकर ओबीसी को दो भागों में बांट दिया गया। जिसके पास अधिक पैसा था ..जो आरक्षण का मजबूत हिस्सा बन सकता..नेतृत्वकर्ता बन सकता...उसे अलग करना बहुत बड़ी साजिश थी.संवैधानिक दृष्टिकोण पर आप नजर डालेंगे तो यकीन होगा कि ओबीसी समाज का उचित प्रतिनिधित्व अभी भी नहीं मिल पाया है जब उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया तो क्रीमीलेयर लगाने की आवश्यकता क्यों पड़ी..? भारत की न्यायपालिका व्यवस्था क्रीमी लेयर का फैसला देकर ओबीसी को बहुत बड़ा झटका दे दिया।
उसके बाद भी ओबीसी समाज इतने अधिक थे तो क्रीमी लेयर की व्यवस्था को गुमराह करने के लिए रचित मुद्दा बाबरी मस्जिद को उठाया गया ताकि ओबीसी क्रीमी लेयर पर कोई बड़ा आंदोलन न कर सके क्योंकि 1990 के दशक में ओबीसी भारतीय राजनीति में चमकते हुए सितारे के तौर पर नजर आ रहे थे।
अब ओबीसी समाज बाबरी विध्वंस में मुसलमान के आमने सामने हुई... इसलिए क्रीमी लेयर की व्यवस्था बरकरार रही। प्रमोशन में आरक्षण की व्यवस्था 1962 में दी गई और उसमें कहा गया था कि शैक्षणिक और सामाजिक पिछड़ेपन वाले लोगों का उचित प्रतिनिधित्व नहीं होगा तो प्रमोशन में भी आरक्षण दिया जाएगा.. परंतु न्यायपालिका व्यवस्था ने पदोन्नति में आरक्षण पिछड़ा वर्ग को नहीं दिया...
1995 के दौर में भारत की राजनीतिक स्थिति डगमगाने लगी तो मजबूरन जातिवादी मानसिकता ने अनुसूचित जाति को पदोन्नति में आरक्षण तो दिया लेकिन वरिष्ठता के आधार पर उसे नहीं माना.. यह 77 वां संविधान संशोधन के द्वारा हुआ था।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलट कर अनुसूचित जाति को पदोन्नति में आरक्षण तो दे दिया गया लेकिन ओबीसी समाज को पदोन्नति में आरक्षण क्यों नहीं दिया गया..?
अगर सर्वोच्च पदों पर ओबीसी समाज स्थापित हो जाता तो आरएसएस विचारक और मनुवादी विचारधारा वाले लोगों का धीरे-धीरे कब्जा खत्म हो जाता। इसलिए उन्होंने सोचा कि ओबीसी समाज को पदोन्नति में आरक्षण से वंचित कर दिया जाए।
आपको जानकर बहुत आश्चर्य होगा कि 1992 में ओबीसी को 27% रिजर्वेशन दिया गया किंतु एक लंबे अरसे के बाद भी ओबीसी समाज भारत के सर्वोच्च पदों पर अपना कब्जा नहीं जमा पाया.. एक रिपोर्ट के मुताबिक ओबीसी समाज भारत के निम्न पदों पर मात्र 6% ही आधिकार मिल सका है, अगर यही गति रही तो 300 साल में ओबीसी को अपना अधिकार मिलने में लग जायेगा।
सरकार और मनुवादी विचारधारा वाले व्यक्ति ओबीसी की जाति जनगणना से अभी भी चिंतित हैं। भारत के बहुसंख्यक समाज सोशल मीडिया के द्वारा अत्यधिक संगठित हो रहे हैं इसीलिए प्रधानमंत्री ने कहा कि अब हमें सोशल साइट छोड़ देना चाहिए इसके बाद मोहन भागवत का बयान आया कि हिंदुओं से आग्रह है कि वह अपने सोशल साइट पर अधिक समय ना दें।
शायद इसीलिए अटल बिहारी वाजपेई 1988 में इंटरनेट और कंप्यूटर का विरोध बैलगाड़ी से संसद यात्रा करके किए थे। क्योंकि बहुसंख्यक समाज जितना संगठित और विचारों से परिपूर्ण होता जाएगा उतना अत्यधिक मनुवादी ताकतों की स्थिति चरमरा ती हुई नजर आएगी।
पत्रकार रंजीत कुमार

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